Sudarshan Faakir by Muslim Saleem

sudarshan fakir


Sudarshan Kamra
(1934–2008) better known by as Sudarshan Faakir  was an Indian poet and lyricist. His ghazals and nazmswere sung by Begum Akhtar and Jagjit Singh. Sudarshan Fakhir was born in 1934 in Ferozpur, Punjab. He belonged to the small and diminishing tribe of non-muslim urdu poets from east punjab. His compositions may not have been prolific, but each is remarkable for its profundity and perfection. He was the first Lyricist to have won a Filmfare Award for the very first song he wrote. Apart from the hits like ‘woh kagaz ki kashtii’, he was famous for a religious number ‘Hey Ram… Hey Ram’. National NCC Song of India- ‘Hum Sab Bhartiya Hain’ was written by him. Apart from Non-Film music, Sudarshan Faakir has penned songs from various films also.

He studied MA in political science and English from DAV College, Jalandhar. Active in dramatics and poetry right from his college days, he directed Mohan Rakesh‘s play “Ashadh Ka Ek Din” in his youth.[1]

He lent his voice to AIR, Jalandhar before he left for Bombay where he later wrote for music directorJaidev. His song ‘Zindagi, zindagi, mere ghar aana zindagi’ from Bhim Sen‘s ‘Dooriyan‘ as well as dialogues for the film ‘Yalgaar‘ are popular till date. It is also claimed that the song, “Hum sab Bhartiya hain”, which is sung at the NCC camps across the country, was penned by him.

Faakir belonged to the small and diminishing tribe of non-Muslim Urdu poets from East Punjab. Sudarshan Faakir is the first lyricist to have won a Filmfare Award for his very first song. Apart from the hits like Woh Kagaz Ki Kashti, he was famous for a religious number – Hey Ram… Hey Ram. He is the Writer of National NCC Song of India- Hum Sab Bhartiya Hain. Apart from Non-Film Music, Sudarshan Faakir has Penned Songs from various films also.[2]

Sudarshan ‘Faakir’ was the favourite poet of ‘Mallika-e-ghazal’ Begum Akhtar in her last phase, She sang five of his ghazals. He was also the co-traveller of Jagjit Singh, an association that began with ‘Woh kagaz ki kishti, woh barish ka pani’ in 1982.

A perfectionist to the core, he laboured hard over his poetry. Faakir is perhaps one of the last of the tribe of vanishing poets who lived for poetry and it is noteworthy that he put together his poetry in an anthology and published his first ‘diwan‘ only after he became a much-celebrated poet.

Sudarshan died on 18 February 2008, at a hospital in Jalandhar, at the age of 73, after a prolonged illness. He was cremated at Model town.

Sudarshan was married to Sudesh. The couple have a son Manav, daughter-in-law Ishita and grandson Aryaman.

سدرشن فاکر عِشق میں غیرتِ جذبات نے رونے نہ دِیا
ورنہ کیا بات تھی، کِس بات نے رونے نہ دِیا

آپ کہتے تھے کہ رونے سے نہ بدلیں گے نصیب
عمر بھر آپ کی اِس بات نے رونے نہ دِیا

رونے والوں سے کہو اُن کا بھی رونا رو لیں
جن کو مجبورئ حالات نے رونے نہ دِیا

اُن سے مِل کر ہمیں رونا تھا، بہت رونا تھا
تنگئ وقت مُلاقات نے رونے نہ دِیا

ایک دو روز کا صدمہ ہو تو، رو لیں فاکر !
ہم کو ہر روز کے صدمات نے رونے نہ دِیا

سدھرشن فاکر

Extract from others work about Sudarshan Fakir

Ravindra Kalia in his book “Ghalib chhuti sharaab” :

फ़ाकिर का कमरा एक मुसाफिरखाने की तरह था। सुदर्शन फ़ाकिर इश्‍क में नाकाम हो कर सदा के लिए फीरोजपुर छोड़ कर जालंधर चला आया था और उसने एम.ए. (राजनीति शास्‍त्र) में दाखिला ले लिया था। बाद में, बहुत बाद में अपने अंतिम समय में बेगम अख्तर ने फ़ाकिर की ही सबसे अधिक गजलें गाईं। उसकी एक गजल ‘हम तो समझे थे बरसात में बरसेगी शराब, आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया’ गजल प्रेमियों में बहुत लोकप्रिय हुई। बेगम जब पाकिस्‍तान गईं तो फ़ैज अहमद ‘फ़ैज’ ने फ़ाकिर की लिखी हुई ठुमरी ‘देखा देखी बलम होई जाय’ उनसे दसियों बार सुनी थी। मगर मैं तो उस फ़ाकिर की बात कर रहा हूँ, जो इश्‍क में नाकाम हो कर जालंधर चला आया था और शायरी और शराब में आकंठ डूब गया था। जालंधर आ कर वह फकीरों की तरह रहने लगा। उसने दाढ़ी बढ़ा ली थी और शायरों का लिबास पहन लिया था। उसका कमरा भी देखने लायक था। एक बड़ा हालनुमा कमरा था, उसमें फर्नीचर के नाम पर सिर्फ दरी बिछी हुई थी। बीच-बीच में कई जगह दरी सिगरेट से जली हुई थी। अलग-अलग आकार की शराब की खाली बोतलें पूरे कमरे में बिखरी पड़ी थीं, पूरा कमरा जैसे ऐशट्रे में तब्‍दील हो गया था। फ़ाकिर का कोई शागिर्द हफ्‍ते में एकाध बार झाड़ू लगा देता था। कमरे के ठीक नीचे एक ढाबा था। कोई भी घंटी बजा कर कुछ भी मँगवा सकता था। देखते-देखते फ़ाकिर का यह दौलतखाना पंजाब के उर्दू, हिंदी और पंजाबी लेखकों का मरकज बन गया। अगर कोई कॉफी हाउस में न मिलता तो यहाँ अवश्‍य मिल जाता। दिन भर चाय के दौर चलते और मूँगफली का नाश्‍ता। अव्‍वल तो फ़ाकिर को एकांत नहीं मिलता था, मिलता तो ‘दीवाने ग़ालिब’ में रखे अपनी प्रेमिका के विवाह के निमंत्रण-पत्र को टकटकी लगा कर घूरता रहता। इस एक पत्र ने उसकी जिंदगी का रुख पलट दिया था।

फ़ाकिर का यह चैंबर पंजाब की साहित्‍यिक और सांस्‍कृतिक गतिविधियों का स्‍नायु केंद्र था। विभाजन के बाद जालंधर ही पंजाब की सांस्‍कृतिक राजधानी के रूप में विकसित हुआ था। आकाशवाणी और दूरदर्शन के केंद्रों के अलावा पंजाब में हिंदी के समाचार-पत्र केवल जालंधर से प्रकाशित होते थे। पंजाब विश्‍वविद्यालय का हिंदी विभाग भी जालंधर में ही था। शास्‍त्रीय संगीत का वार्षिक कार्यक्रम हरिवल्‍लभ भी जालंधर में आज तक आयोजित होता है। आकाशवाणी के कार्यक्रमों के सिलसिले में हिंदी, पंजाबी अथवा उर्दू का कोई रचनाकार जालंधर आता तो वह फ़ाकिर के कमरे में चरणमृत प्राप्‍त करने जरूर चला आता। चौबारे के नीचे ही होटल था। चाय, भोजन की अहर्निश व्‍यवस्‍था रहती। फ़ाकिर का कमरा रेलवे रोड पर था, रात भर कोई न कोई ढाबा अवश्‍य खुला रहता। फ़ाकिर के होटल का बिल ही काफी हो जाता होगा, मगर उसके चेहरे पर मेहमान को देख कर कभी शिकन नहीं आई। मैंने कभी किसी होटल या ढाबेवाले को उसके यहाँ पैसे के लिए हुज्‍जत करते नहीं देखा था।